बिन तेरे कोई कैसे मुझे जला पाता
ओ घृत,तुझसे हर पल,हर क्षण मिलूं मै
तुम न हो तो निरंतर कैसे जलूं मै
ओ पात्र तुझे कैसे भुला भी सकूंगा
तुम न हो तो कैसे एक आकर में ढ़लूंगा
ओ कहां गई प्राणवायु तू मेरी
मोहताज़ तेरे ये आयु है मेरी
तुम सब न हो तो कैसे इक पल जल भी सकूंगा
मैं तुम सबकी ख़िलाफत कर भी न सकूंगा
मगर भूलना न तुम सब एक बात
हम सब को मिलने में किसका है हाथ
मेरा सृजन उसके बिन है अधूरा
जैसे बिन तार हो बेबस तंबूरा
मेरे जीवन में हरदम जो साथ हैं
वो मनुष्य के पावन दो हाथ हैं
हमें मिलते दिल के उद्गार उसके
हमें जलाते निश्चल विचार उसके
हमको गर अपना वंश है बढ़ाना
दुश्मन अंधेरे का दंश है घटाना
तो उजालों से प्रेम करने का हुनर उसे सिखाना है
मनुष्य को शैतान होने से बचाना है
मनुष्य को शैतान होने से बचाना है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
post your comments