रविवार, 19 अगस्त 2012

अगर हम सिर्फ अपना तन साफ़ रखेंगे;Thought

"अगर हम सिर्फ अपना तन साफ़ रखेंगे किन्तु घर और मोहल्ला अशुद्ध  रहेगा तो व्याधियों से हम बहुत देर तक दूर नहीं रह सकते .सामाजिक परिवेश मे उपरोक्त जुमले को हम घर समाज और मुल्क की परिपाटी पर रख कर सोचे की क्या हम ये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नहीं कर रहे .अगर जवाब हाँ है तो या तो हम बीमार हैं या बहुत जल्दी बीमार होने वाले हैं"।राकेश "निर्मल"

मंगलवार, 14 अगस्त 2012

देश प्रेम में नज़्म

वर्चस्व की भूख है खुराक मे तुम्हारा  स्वाभिमान चाहिए ,
पड़ोस मे चीन कह रहा  घुटनों मे हिन्दुस्तान चाहिए।

विषाक्त मंसूबे और ज़हरीले घटक उत्पादन का हिस्सा है ,
फिर भी क्यों  हम सबको चीन मे बना सामान चाहिए।


जिस तरफ भी नज़र जाए है भीड़ राहे भ्रस्टाचार  मे,
मुल्क को हर हाल मेये नापाक राह अब सुनसान चाहिए।

अरे यहाँ पर सब कुछ ऐसे हि चलेगा  कुछ नहीं बदलेगा,
इस तरह की मुर्दनी को साहब ज्वलनशील लुभान चाहिए।

फफक फफक कर कह  रही है माँ बस इतनी आरज़ू  है मेरी,
मुझे मन कर्म वचन से निर्मल सिखहिन्दूमुसलमान चाहिए।



शनिवार, 14 जुलाई 2012

बस इसलिए पहुंचा फलक तक मै खाक से;Ghazal

बस इसलिए पहुंचा फलक तक मै खाक से,
मिलता हूँ जिसको लगता गले वो तपाक  से।

क्यूँ तय नहीं है कुछ भी यहाँ कायनात में ,
क्या बन गयी है खुदाई मियां इत्तेफ़ाक़ से।

मुर्दा निज़ाम है अब ,बेहरकत आवाम है,
जिंदा है सब  कि आ जा रही सांस नाक से।

भरते हैं पेट अपना वतन नोच नोच के,
निर्मल  सभी को  मतलब है अपनी खुराक से।







हो गया मोहाल फिर क्यूँ सांस भी लेना यहाँ ;Muktak

हो गया मोहाल फिर क्यूँ सांस भी लेना यहाँ ,
जब न कुछ लेना किसी से जब न कुछ देना यहाँ।
इसलिए अपने दुःख पर खुल के हंस ले तू ज़रा ,
क्रंदन कहीं सुन कर तुम्हारा जग हँसे  ना  यहाँ।

शुक्रवार, 29 जून 2012

मौलवी का ना सही;Ghazal



मौलवी का ना सही आवाम का विश्वास हूँ,
दूर मस्जिद है बहुत पर  मैं खुदा के पास हूँ

इसलिए कोई मुझे कहता यहाँ काफिर नहीं,
दूर मस्जिद है बहुत पर  मौलवी का ख़ास हूँ।
ok

शनिवार, 26 मई 2012

है अमन ज़हन में दिल मे मेरे सबूरी है,;Ghazal

है अम्न  ज़हन में  दिल मे मेरे  सबूरी है,
मैं सोचता हूँ  बस उतना जितना  जरूरी है !

जिंदगी मिली जैसे, जी लिया उसे वैसे
मानो या ना  मानो  पर  ये भी  जी हजूरी है !