शनिवार, 21 जनवरी 2017

सब बह गयी  नदी पीछे  बस पाट  रह गए
हम जोहते जाने किसकी यहाँ बाट रह गए 

 रंगीन   संत  सब  हो  गए  राज  रंग  में 
बाकी कहाँ वे चित्रकूट के घाट रह  गए 

सोने चला  गया  वो खा पी के पलंग  पर 
बिनते  यहाँ उसूलों की हम खाट रह गए 

सारे चमक दमक पाने को शहर चल दिए 
अब  धूप  बेचते  गाँव  में  हाट  रह गए 

 आया  चुनाव  नेता  सभी  एक हो गए   
 हम बँट के बरहमन तो कहीं जाट रह गए 



शनिवार, 14 जनवरी 2017

जला कर हसरतें  दिल की नज़ारा  कर लिया हमने
क़रार-ए-दिल मिले तुझको ख़सारा कर लिया हमने 

सुकूँ मिलता है जो झुक कर ज़रा  सा झाँक  लेते हैं 
तेरे हर नाज़ को दिल का सितारा कर लिया  हमने 

कि  जलवे  उसके बैसाखी हुए  ऐ   ज़िन्दगी तब तो 
तेरी  राहों में  फ़िर  चलना  गँवारा कर  लिया हमने 

भुला न  पाएंगे  तुझको  मगर फ़िर  भी  ना  रोयेंगे 
तेरे ग़म का  नहीं ख़ुद का  सहारा कर लिया हमने 

शिकस्त-ए -जाँ  भले दे दे लड़ेंगे  ज़िन्दगी  तुझसे 
तेरे हर ज़हर का  'निर्मल' उतारा कर लिया  हमने 



दाँव चलते   रहे   सभी अपना 
मुल्ला पंडित वो पादरी अपना 

है मयस्सर ये मुफ़्त  में लेकिन 
मोल रखती है सादगी  अपना 

वक़्त पर सब मुकर गए पर माँ 
झट से  कंगन  उतारती अपना 

ग़ैर  का तो  नहीं  हो  पाया  है 
खुद का हो जाए आदमी अपना 

दुनिया इस पर अमल करे निर्मल 
पैगाम-ए -फ़र्ज़ आखिरी अपना 

रविवार, 12 जून 2016

गीत तुमने जो दिया शिद्दत से गाया  है मियाँ ,
हमने हर किरदार को दिल से निभाया है मियाँ। 

इस तरफ तो दौलतें तुझको कराती हैं सफ़र ,
उस तरफ तो नेकियों का ही किराया है मियाँ। 

जागना जो चाहे इक आवाज़ मैं उठ जायेगा ,
झूठा सोने वाले को किसने जगाया  है मियाँ। 

छोड़ झूठे कहकहे  बस मुस्कुराने दे मुझे ,
आज मुश्किल से ये मौका हाथ आया है  मियाँ। 

माँ चुपड़ कर आंसुओं से रोटियाँ खाती रही ,
हँस के जिसने बेटों पर सब कुछ लुटाया है मियाँ। 

फासले  कमरों के कमतर थे दिलों के सामने ,
पास अपने धूप  लेकिन दूर साया है मियाँ।

उस परिंदे को कफ़स मे फ़िक्र है  परवाज़ की ,
मन ही मन सय्याद उस पर तिलमिलाया है मियाँ। 

ज़िन्दगी ज़ेवर न बन पाई खरा सोना थी वो ,
खोट हमने जान कर इसमें मिलाया है मियाँ। 








मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

छोड़ कर हमको वो गया जबसे ,
 बेकफ़न लाश ढ़ो रहे तबसे !

उम्र सारी गुज़ार दी घर में ,
वक़्ते रुखसत ही वो मिला सबसे !

गोद में  माँ की सर छिपाया तो ,
दिल को ऐसा लगा मिला रब से !

क्या ख़ुशी मैं नहीं तेरी ज़द में ,
तूने देखा नहीं मुझे कब से !

राज़ सब जानता है वो उसके,
चाँद  की बात क्या करें शब से !

कल मिला था वो बाअदब लेकिन ,
वक़्त फिर जब मिला नए ढब से !

 तुमसे  अब क्या कहें सुने "निर्मल "
सी लिए होंठ आज से अब से !











 

शनिवार, 11 जुलाई 2015

मुंशिफ से हम गुनहगार होते चले गये
बच्चे मेरे समझदार होते चले गए।

बचपन में सिर्फ बनती थी दिल और ज़हन में
आपस में फिर पलटवार होते चले गए।

जब से सलीका आया ग़ज़ल कहने का हमें
 हम और भी असरदार होते चले गए।

चाबुक लगायी सच ने फ़क़त एक झूठ पर
फिर झूठ सब ख़बरदार होते चले गए।

पहले ज़मीन ए दिल  पर किराये से घर लिया
हौले से फिर ज़मींदार होते चले   गए

निर्मल उन्होंने हल्का जो किरदार कर लिया
 बस तबसे वो वज़नदार होते  चले गए।





रविवार, 21 जून 2015

ग़ज़ल

प्यार  का  बेज़ुबाँ पर असर देखिये ,
शाख पर खूबसूरत ये घर देखिये। 

इस के कहने पे हमने लगाया इधर,
अब ये दिल  कह रहा है उधर देखिये। 

खुद से मिलने में तुमको लगेगी उमर ,
आप करके कभी यह सफर देखिये। 

अपनी मिटटी से होकर जुदा आजकल,
फिर रहा है बशर दर बदर देखिये। 

उम्र छोटी सही कर्म लेकिन बड़े ,
राह  सच्ची भले मुख़्तसर देखिये। 

इससे बेहतर  गवाही ये माँ कैसे दे ,
हाथ बच्चे के सर  आँख तर देखिये। 

राम नानक मोहम्मद या जीसस कहो ,
राह सबकी रही पुरखतर देखिये। 

गम में रोयेगी दुन्या तेरे साथ  में ,
टाल  देगी खुशी मांग कर देखिये। 

तेज़ भागा फक़त एक  मंज़िल  मिली ,
इस जुनूँ का अभागा सफर देखिये। 

दूसरे की खबर तीसरे  से मिली ,
वो है "निर्मल " बड़ा बेखबर देखिये।