बुधवार, 13 सितंबर 2017

जो तू  समझा   रहा है   मुझे रात से
क्या तू ख़ुद मुतासिर है उसी बात से 

क़दमों में अब ये दस्तार गिरती नहीं 
 समझौता कर लिया मैंने हालात  से 

जश्न कैसा कैसी शादी कैसी दुल्हन 
जब के गायब है दूल्हा ही बारात से 

कैसे  खुल के मिले  बंदिशे हैं बहुत  
ख़ुद  से मज़बूर तू, मै मेरी  ज़ात से 

घर नहीं   देखती  गिरने से पहले ये 
कुछ तो सीखा होगा तुमने  बरसात से 

पैरवी   कौन  करता है  सच की यहाँ 
कौन मज़बूर  है  अपने ज़ज़्बात से





शनिवार, 26 अगस्त 2017

 सिर्फ रोया  कभी हँसा  ही नहीं
 मरने से पहले वो जिया ही नहीं

टाल देता था  जो भी चाहे वो 
मौत का वक़्त तो टला ही नहीं 

तेरी खातिर जियेगा क्या कोई 
तू  किसी के लिए मरा ही नहीं 

अपना घर बस बचा हो, बाक़ी फ़िर 
आजकल ख़ून खौलता ही नहीं 

जैसे सब आये तू भी  आ जाता 
सब गिरे थे ,तू तो उठा ही नहीं 

कितने नादाँ हैं ,जो  ये कहते हैं 
अपने जैसा कोई मिला ही नहीं 

बोलते  हैं  वक़ील अब निर्मल 
अब तो कानून बोलता ही नहीं 

मैं  आफ़ताब ,वो तीरगी देखता  रहा 
मैं  शुक्र और वो , लानतें भेजता रहा 

सब  खेल में तिरे, मेरे ज़ज़्बात साथ  थे 
 पर तू  तो मिरे, ज़ज़्बात से  खेलता रहा 

आगे नहीं  बढ़ा तू  न कुछ भूलने दिया 
ऐ वक़्त तू  मिरे ज़ख्मों को छेड़ता रहा 

होगा गुरूर उसको  यही  इल्म था मुझे 
अब ये खुला कि वो आदतन झेंपता रहा 

कश्ती में उसके पानी, सुराखों से आ रहा 
लेकिन वो बाल्टी से   उसे फेंकता रहा 

मुमकिन नहीं ये, फ़िर भी मिरा जिस्म बख़्श दे 
चौखट पे मौत के ,माथा मै टेकता रहा 






मंगलवार, 18 जुलाई 2017

कायरता की हद तक  कभी  सहना मत सीखो 
इक दायरे में तालाब की तरह बहना मत सीखो 
नर्क है ये घर  तो क्या   राजा हो तुम इसके 
स्वर्ग में बन के दास कभी रहना मत सीखो

रविवार, 11 जून 2017

दौलत हवस नशे से तो अनजान ही रहूँ
ओहदा पहन लूँ  फिर भी मैं इंसान ही रहूँ 

होठों  पे आऊँ रुस्वा करूँ  तुझको उम्र भर 
बेहतर है   मैं तेरे  दिल का अरमान ही रहूँ 

बचपन में जैसे हँस के लिपटते थे दोस्त से 
मौला करे की इतना तो नादान  ही रहूँ 

ख़ुद  को ख़ुदा  समझ के सितम कर रहें हैं सब 
मैं रब के सच्चे बन्दे की पहचान ही रहूँ 

निर्मल सुकून-ए -दिल का सबब हो मेरी ग़ज़ल 
सब के लबों पे बन के मैं मुस्कान ही रहूँ 


गुरुवार, 1 जून 2017

महज़ दरिया में गिरने से कभी कोई नहीं डूबा 
वही डूबे हैं जिनको तैरने का फ़न नहीं आता 
                                                   ग़ज़ल

उसके दर तक आ गए देहरी पे जाना बाक़ी  है 
द्वार  पर साँकल  लगी है   खटखटाना बाक़ी है 

 तोड़  कर   सारे  मरासिम लौट आया हूँ   यहाँ 
 दिल में उसके वास्ते नफ़रत  का आना बाक़ी है 

आशियाँ शहरों में कितने ही  बना लेना मगर 
 याद रखना गाँव  में छप्पर पुराना बाक़ी है 

कुछ दिनों तक और शायद  जिस्म में उलझा रहूँ 
कुछ दिनों तक और शायद आब-ओ-दाना बाक़ी है 

बात करता है तो लहज़े से झलकती है वफ़ा 
वार करता है तो लगता है निशाना बाक़ी है 

पास दौलत हो न हो पर सब अदब से मिलते हैं 
दिल में  लोगों के बुज़ुर्गों का ठिकाना बाक़ी है 

उठ के जाते हो कहाँ  फ़ेहरिश्त  लम्बी है ज़रा 
इक फ़साना ख़त्म लेकिन इक फ़साना बाक़ी है

ढेर सारी   धूप  थी आँगन था पूरा  वक़्त था 
आज भी "निर्मल" दिलों में वो ज़माना बाक़ी है