शनिवार, 10 फ़रवरी 2018

       ग़ज़ल

इसलिए  दर्द ज़ियादा है, ख़ुमारी कम  है
ज़िन्दगी बीती ज़ियादा है ,गुज़ारी कम है 

 माँग कर लाये थे साँसों का, जो सरमाया हम 
सब हुआ ख़र्च कि अब तो, ये उधारी कम है 

क्या समझ रक्खा है तुमने ओ, जम्हूरे ख़ुद को 
मत समझना किसी सूरत ये ,मदारी कम है 

 जब से क्या थोड़ा नवाज़ा है ख़ुदा  ने उसको 
 तब से भगवान ज़ियादा है ,पुजारी कम है 

ये सियासत है यहाँ सब की, दुकाँदारी है 
सोम संगीत  है सीधा न ,बुख़ारी कम है 

रविवार, 12 नवंबर 2017

                                                          ग़ज़ल

 इतना हो पाए  मैं कुछ अश्कों को गौहर कर दूँ 
 जो  मिले मुझसे उसे  थोड़ा सा  बेहतर कर  दूँ 

कूच करने आ गए बुज़दिलों को लेकर तुम 
लाव लश्कर ऐसे तो  रोज़ मैं सत्तर कर दूँ

परवरिश मेरी गँवारा ये नहीं  करती है
आपके कहने से इक फ़ूल को नश्तर कर दूँ

चंद शाइर हैं यहाँ ,कहते हैं, तुम बोलो तो
फ़ूल की शाख़, ज़रा देर में ख़ंजर कर दूँ

मक़सद ए शाइरी कुछ भी नहीं बस इतना है 
उसके हर बन्दे को मैं अम्न का लश्कर कर दूँ




शनिवार, 11 नवंबर 2017

                                                                       
                      गीत 

हम पे इतनी कृपा करना भगवन 
देश  के काम आये ये तन मन 
विश्व के हम गुरु थे ,रहेंगे 
देश माटी बने जग का  चंदन। 

ख़ुद को बांधे न रक्खे किलों में 
आओ थोड़ा सा रहले दिलों में 
सम्प्रदायों के फेंके न पासे 
ख़ौफ़ खायें ज़रा तो ख़ुदा  से 
स्वर कान्हा की बंसी  के गूंजे 
हो सवेरा अज़ानों से रौशन। 

हम पे इतनी---------------
देश के काम --------------

आचरण से सिखाएँ सभी को 
बन्दगी से हरायें बदी को 
मन में पाले चलो अब ये आशा 
दूर सदियों का होगा कुहासा 
झूठ की आओ सत्ता हिला दें। 
सच के हक़ में चलों करके अनशन। 

हम पे इतनी---------------
देश के काम -------------

अपनी थाली से आओ निकाले 
दूसरों के लिए भी निवाले 
फ़ूल बनकर सँवारे चमन को 
कर लें मुट्ठी मे आओ  गगन को 
अपने किरदार में वो चमक हो 
अपने चेहरें बने जैसे दर्पण। 

हम पे इतनी---------------
देश के काम --------------

वो सवेरा दिखा दो हमें अब 
मेरे भारतकी  चर्चा करें सब 
एक दिन ये भी होकर रहेगा 
दूध नदियों में फ़िर से बहेगा 
ज्ञान का सूर्य घर में उगायें 
कर दें आओ तिमिर का विसर्जन।

हम पे इतनी---------------
देश के काम --------------





बुधवार, 13 सितंबर 2017

जो तू  समझा   रहा है   मुझे रात से
क्या तू ख़ुद मुतासिर है उसी बात से 

क़दमों में अब ये दस्तार गिरती नहीं 
 समझौता कर लिया मैंने हालात  से 

जश्न कैसा कैसी शादी कैसी दुल्हन 
जब के गायब है दूल्हा ही बारात से 

कैसे  खुल के मिले  बंदिशे हैं बहुत  
ख़ुद  से मज़बूर तू, मै मेरी  ज़ात से 

घर नहीं   देखती  गिरने से पहले ये 
कुछ तो सीखा होगा तुमने  बरसात से 

पैरवी   कौन  करता है  सच की यहाँ 
कौन मज़बूर  है  अपने ज़ज़्बात से





शनिवार, 26 अगस्त 2017

 सिर्फ रोया  कभी हँसा  ही नहीं
 मरने से पहले वो जिया ही नहीं

टाल देता था  जो भी चाहे वो 
मौत का वक़्त तो टला ही नहीं 

तेरी खातिर जियेगा क्या कोई 
तू  किसी के लिए मरा ही नहीं 

अपना घर बस बचा हो, बाक़ी फ़िर 
आजकल ख़ून खौलता ही नहीं 

जैसे सब आये तू भी  आ जाता 
सब गिरे थे ,तू तो उठा ही नहीं 

कितने नादाँ हैं ,जो  ये कहते हैं 
अपने जैसा कोई मिला ही नहीं 

बोलते  हैं  वक़ील अब निर्मल 
अब तो कानून बोलता ही नहीं 

मैं  आफ़ताब ,वो तीरगी देखता  रहा 
मैं  शुक्र और वो , लानतें भेजता रहा 

सब  खेल में तिरे, मेरे ज़ज़्बात साथ  थे 
 पर तू  तो मिरे, ज़ज़्बात से  खेलता रहा 

आगे नहीं  बढ़ा तू  न कुछ भूलने दिया 
ऐ वक़्त तू  मिरे ज़ख्मों को छेड़ता रहा 

होगा गुरूर उसको  यही  इल्म था मुझे 
अब ये खुला कि वो आदतन झेंपता रहा 

कश्ती में उसके पानी, सुराखों से आ रहा 
लेकिन वो बाल्टी से   उसे फेंकता रहा 

मुमकिन नहीं ये, फ़िर भी मिरा जिस्म बख़्श दे 
चौखट पे मौत के ,माथा मै टेकता रहा 






मंगलवार, 18 जुलाई 2017

कायरता की हद तक  कभी  सहना मत सीखो 
इक दायरे में तालाब की तरह बहना मत सीखो 
नर्क है ये घर  तो क्या   राजा हो तुम इसके 
स्वर्ग में बन के दास कभी रहना मत सीखो