अब मौत खड़ी है सामने तो रो रहे हैं आप
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गुरुवार, 5 अगस्त 2021
मुक्तक
दूसरों का दर्द न जाने क्यों फांकते हैं
दर्द दिखा नहीं की आंखों से झांकते हैं
आंखों की देहरी ये फौरन लांघते हैं
आंखों के आंसू है शायद दिल मांजते हैं
मुक्तक
बूंद बूंद करके ये रोज रिस रही है
मौत की चाकी में हर दिन ये पिस रही है
काहे का गुरूर है,कैसा ये अभिमान
ज़िन्दगी की पेंसिल जब रोज घिस रही है
मुक्तक पर मुक्तक
तस्वीर पुरानी है पर ये मुक्तक नया है
इतना बतादें की ये मुक्तक कल ही भया है
छोटी सी इल्तिज़ा है,इतना ही मुझे बता दो
क्या भाव हमारा तुम्हारे दिल तक गया है?
मुक्तक
क्यों हंसने के तराने भूलते हो
क्यों अवसाद के झूले झूलते हो
खुशियों के हिंडोले छोड़ के तुम
क्यों रोने के बहाने ढूढते हो
शनिवार, 30 जनवरी 2021
2122 2122 2122 212
ज़ख़्म सारे एक दिन अपने भरेंगे देखना
खिलखिला कर लोग सारे, फिर हँसेंगे देखना
आंसुओं का क्या है हमको सोच कर देखो ज़रा
आपके रुख़सार पर, ढलके मिलेंगे देखना
क्या हुआ जो इस जहाँ में मिल न पाए आपसे
उस जहाँ में आपसे, निश्चित मिलेंगे देखना
सदियों से भारत वतन ही मांगते आये हैं हम
फूल बन कर इस चमन में, फिर खिलेंगे देखना
ख़ाक को तुम भी बदन कहने लगे हो आजकल
हम बदन को ख़ाक कहते ही रहेंगे देखना
हम से हो पाया नहीं तो आपसे होगा नहीं
दुनिया वाले कह रहे थे, फिर कहेंगे देखना
ज़िन्दगी बस में नहीं ,बस दिल लगाने के लिए
घर बसने की की जुगत में, चल बसेंगे देखना
बुधवार, 27 जनवरी 2021
२१२ २१२ २१२ २१२
सीधे सच्चे से बेसाख़्ता अलफ़ाज़ नइ
अब तेरी गुफ़्तगू में वो अंदाज़ नइ
जब तलक तू था अपना ,बहुत लड़ते थे
अब किसी बात पर तुझसे नाराज़ नइ
जब से शाइर सियासी हुआ है मियाँ
उसकी पैनी कलम में भी आवाज़ नइ
उसके हालत अच्छे नहीं हैं ,मगर
आदमी अच्छा है वो, दगाबाज़ नइ
शे'र भी कह दूँ मै,ख़ून भी सूखे नइ
इस तरह की किसी की भी परवाज़ नइ
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