रविवार, 9 अगस्त 2026

मेरे गीत

गीत मेरे क्यारियां,
फूलों की सवारियां
खुशबुओं की बस्तियां,
भंवरों सी हैं मस्तियां
ज़िन्दगी के रंग हैं
करुणा है उमंग है
इनके आवरण में 
खुद को छुपाइए 
आप गुनगुनाइए
और मुस्कुराइए।

विचारबिंदु सा कभी
अपार सिंधु सा कभी
सीधा सरल वेश है
मौलिक परिवेश है
भूख है ये पेट की
तिजोरी है ये सेठ की
आत्मा आधार है
शब्द अलंकार है
चंदन इसे जानकर
ललाट पर सजाए
आप गुनगुनाइए
और मुस्कुराइए

भावना का द्वंद्व है
गद्य ,पद्य छंद है
भावों का ये डिंब है
निर्भीक प्रतिबिंब है
शून्य है अनंत है
अर्थ भी ज्वलंत हैं
मन की दीवार पर 
चित्र सा सजाए
आप गुनगुनाइए
और मुस्कुराइए 


खुद में सिमटकर

दाग उसके इसलिए मिटते नहीं,
आइना पूछता है चेहरा समझकर
शख्सियत उलझी उलझी सी है उसकी
खुद से मिला नहीं खुद में उतरकर
दीवाना है शायद या नया है शहर में
फैलने की बात करता है खुद में सिमटकर

जुगनू

हर शै पर हैं ,गुलामी की सैकड़ों परतें
सदियों से उन्हीं तंग रास्तों को पकड़ते
अंधेरों के आदी,इस कदर हो गए हम
कि नई सोच के जुगनू ,भी आंखों को खटकते।

कोई नहीं सोचता

ज़ाहिर सी बात है पर कोई नहीं सोचता
हर जिस्म एक मंदिर है,हर इंसान देवता
मन के विशाल आंगन में रहता है वो शान से
मज़हब की तंग गलियों में तू जिसे खोजता।

कागज़ के फूल

कागज़ के फूलों से हैं,खून के रिश्ते
देखने सुनने में क्या खूब हैं जचते 
दूर से ही इनका लुत्फ लीजिए जनाब
बहुत करीब से ये असली नहीं लगते

आइना

कौन कहता है आइना हरदम सच दिखाता है
हाथ बदल जाएं तो ये भी बदल जाता है
ख़ुद देखें तो हम खूबसूरत नजर आएं
कोई और दिखाए तो कमियां बतलाता है।



रविवार, 22 जून 2025

  तुम्हारे प्रेम का चन्दन,हमारे मन को महकाये, 
  तुम्हारी देह का मधुबन,हमारे तन को भरमाये। 

तुम्हारे मन की वीणा में, समर्पण की मधुर धुन है,
तुम्हारे शब्दों की झंकार में, रागों  सी रुनझुन है,
तुम्हारी संदली सांसें,हमारे दिल को बहकायें। .. 


तुम्हारा मुस्कुरा देना,   हमें  यूं देख के गोरी ,
अजी फिर देख के न देखने की, कोशिशें पूरी ,
जुगलबंदी ये पलकों की तुम्हारे राज़ कह जाये। 

तुम्हारे केश का गजरा,तुम्हारे कान  की बाली,
की जैसे होठ पर तेरे हो , अलख भोर की लाली 
हमारी चाह है ये  जग हमारी प्रेम धुन गाये।