शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

जाने इस शहर को अब ये क्या हो गया ;Ghazal

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अब न  जाने बशर को ये क्या हो गया
 बात क्या है कि सबको नशा हो गया

हाथ  अपने   बनाते   रहे आशियाँ  ,
वो तो बातें बना कर खुदा  हो गया।

ना जमीं थी न  जोरू न ज़र बीच में
यार  मुझसे मेरा क्यूँ जुदा  हो गया।

अब मुझे याद अब्बा की आती बहुत ,
जब मेरा  खून मुझसे खफ़ा  हो गया।

कुछ खिलौने नए आज मेले में हैं
जो नया था कभी वो फ़ना हो गया 

रविवार, 24 फ़रवरी 2013

युवावस्था हो या वृधावस्था ;Thought

युवावस्था  हो या वृधावस्था ,यह जीवन की समयावधि नहीं है…
यह मानसिक दशा है .लोग आदर्शों को त्यागने और तरुनावस्था की चेतना खोने की वजह से बूढ़े होते हैं
बीता समय त्वचा पर झुर्रियां छोड़ता है पर आपकी उत्साहहीनता आत्मा पर.
आपकी उम्र आपके डर,संदेह अथवा निराशा पर निर्भर करती है.
आपका विश्वास आपको युवा बनाये रखता है.




शुक्रवार, 12 अक्टूबर 2012

और रहने की यहाँ हम को इजाज़त अब नहीं ;Ghazal

और रहने की यहाँ हम को इजाज़त अब नहीं ,
जिस तरफ बहती हवा बहने की आदत अब नहीं।

उस समय से जब मुआफी उसको हमने दी सुनो ,
रोज़ माथे की शिकन दिल मे  अदावत अब नहीं।

शर्म से मर जाते थे हम भूल हो जाती थी जब,
खुद की नज़रों मे मियाँ ऐसी शहादत अब नहीं।

होता मन का गज,  कभी पागल तो बंधन  डालते ,
संस्कारों के  यहां,  ऐसे महावत अब नहीं।

माँ सुनाया करती थी हमको कहानी रात में ,
ज़िन्दगी को बूझते किस्से कहावत अब नहीं।

मानते थे राम को सब मानते थे राम की ,
आजकल "निर्मल" यहाँ ऐसी इबादत अब नहीं।

ok


अदावत:शत्रुता

गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

ज़ियादा हंस के अब आखिर तू हमको क्या बताएगा;Ghazal

ज़ियादा हंस के अब आखिर तू हमको क्या बताएगा,
अगर दिल मे ख़ुशी है तो तेरा चेहरा बताएगा।

मुझे पूरा भरोसा यार  अपनी परवरिश पर है,
अगर मैं बंद कर लूं आँख दिल रस्ता बताएगा।

समंदर पार करना हो तो रख निस्बत  जहाजों से,
तेरा मल्लाह तो दरिया को भी गहरा बताएगा।

मुखालिफ हम यदी  तेरे मुहब्बत भी अगर  बांटे ,
यकीनन इस को भी तू मुल्क पर खतरा बताएगा।

तेरे दिल की सियासत पर ज़माने भर का पहरा है,
मुझे अफ़सोस होगा जब तू दिल अपना बताएगा।

मेरे घर के हैं दरवाज़े बहुत छोटे तेरे आगे,
तू अन्दर आएगा कितना तेरा झुकना बताएगा।


ok
मुखालिफ :प्रतिद्वंदी



मंगलवार, 2 अक्टूबर 2012

आपसे तब हमें फायदा हो गया ;Ghazal

आपसे तब हमें फायदा हो गया ,
आपके गम का जब आसरा हो गया।

जब मिले राह मे  गम मुझे आपके,
गम से मेरे मेरा फासला हो गया।

ढूँढने मे तुझे वक़्त ज़ाया हुआ,
इस बहाने मगर फैसला हो गया।

जब किसी घर मे लायी पिता ने कभी
दूसरी माँ  पिता तीसरा हो गया।







शनिवार, 29 सितंबर 2012

चली आई है तेरी याद हम पर हक जताने फिर;Ghazal

चली आई है तेरी याद हम पर हक जताने फिर,
खुदाया चल पड़ी मेरी अना भी घर बचाने  फिर।

मुसलसल काफिले दिन रात के उम्र  खा गए सारी ,
अजल के सामने है ज़िन्दगी अब मात खाने फिर। .

यही  फ़रियाद अपनी आखिरी अब उस खुदा से है,
पलट कर भेज दे माँ को मेरी मुझको सुलाने फिर।

गए थक जब सभी मोहरे गयीं थक  जब सभी चालें ,
मुखालिफ ने भि  बदला रंग मुझको आजमाने  फिर .

 चलो माना तुम्हारे दौर मे दिन रात पैसा है ,
मगर लौटा दो महकी रात सुलझे दिन पुराने फिर।

सफर में रुक गया तो देखना थक जायेगा जल्द ही,
बताना फ़र्ज़ था अपना कि  आगे आप जाने फिर .

अना :आत्मसम्मान ,
मुखालिफ:प्रतिद्वंदी
अजल :मौत