रविवार, 12 मई 2019

मज़हब के इतने तंग कूचे, घेरे में आया नहीं
दरवेश घूमा दुनिया में , कूचे में आया  नहीं 

जिस्मों को पहना रूह ने ,कुछ पल का है ये पैरहन 
गीता ने कितना समझाया तू कहने में आया नहीं 

इतना कमाया फिर भी जब देने की सोचा कम पड़ा 
भरते रहे बस पेट अपना देने  में  आया नहीं 

हिलडुल रही थी लाश बन ,कहती रही मैं ज़िंदा हूँ 
कटती रही  बस ज़िन्दगी यूँ  ,जीने  में आया नहीं 

पाया ये तो वो छूटा,शिद्दत से पकड़ना चाहा पर 
किस्मत में जितना था मिला ,सब खीसे में आया नहीं 



तेरी  खुश्बुओं के घेरे में सब ख्वाब  हैं ढले 
जीवन के इस सफर में तुम्हे लेके हम चले 
सीने में जलता इश्क़ है कोई आग क्या करे 
दुनिया की फिक्र छोड़ दी जलती है तो जले 
ख्वाबों के फूल  खिल  गए   कचनार हो गए 
हम दोनों के  मन मिल  गए इकसार हो गए 
चेहरे को छू  के ये  नज़र  मुस्कुरा  उठी 
लब उसके छू के लब मेरे गुलज़ार हो गए 

शुक्रवार, 8 फ़रवरी 2019

चहक उठीं हैं कलियाँ देखो वासंती ऋतु आ गयी
मचल उठीं हैं नदियाँ देखो वासंती ऋतु आ गयी 

समग्र धरा के पुष्पों का मन अर्पण को तैयार है 
पीताम्बरी वसन में जैसे  नर्तन को तैयार है 
पलाश मन केसरिया देखो ,वासंती ऋतु आ गयी 

तेरी मुरलिया सुनने को ये बृज  भूमि तैयार है 
सुरामृत पीने को क्षिति की अंजुरी भी तैयार  है 
राधा बोले ओ रसिया देखो वासंती ऋतु आ गयी 

मोहक ऋतु  के सर पर पगड़ी बंधने  को तैयार है 
मदन रति का रथ भी देखो चलने को तैयार है 
प्रदीप्त मन की गलियां देखो वासंती ऋतु आ गयी 

                                           राकेश निर्मल 


गुरुवार, 24 जनवरी 2019

इश्क़ की सीमा तन है , तो तन दुर्योधन हो जायेगा 
इश्क़ की सीमा मन है,तो मन मनमोहन हो जायेगा 
इश्क़ की पाकीज़गी जीवन  में अगर  कायम रही 
बंद आँखों से दिखेगी राधा ,मन लोचन हो जाएगा 

मत बनाओ ख़ुद  को मँहगा ,सस्ता रहने दो 
लोगों  से  मिलने  का  कोई, रस्ता रहने  दो 
तुमको हुक़ूमत करना है ,तख़्त-ए-दिल पर यार 
दिल को दर्द-ए-दुनिया से बाबस्ता  रहने दो 

  
 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2018

१२१२२  १२१२२  १२१२२  १२१२
पुरान कुरआन दोनों ग्रंथो से तेरी पहचान थोड़ी है
यही वजह है कि  उसका अल्लाह तेरा भगवान् थोड़ी है

उसे तो मिलता है वोट मज़हब के नाम पर ,काम पर नहीं
वगरना वो आपके हमारे ग़मों से अनजान थोड़ी है

लगाया पत्थर से दिल तो पत्थर में भी खुदा की झलक मिली
मियाँ ये पत्थर से दिल लगाने में कोई नुक्सान थोड़ी है

सुनो ये ग़ज़लें मेरी हमेशा करेंगी बेदार आपको
ये हुक्म अल्लाह का है मुझको ये कोई एहसान थोड़ी है

जेहाद के सब मआनी  शैतान ने सिखाएँ  है आपको
चलो उसे मार दो वो काफिर है कोई इंसान थोड़ी है

ये शे'र चलते हैं अपनी मर्ज़ी से राज दरबार से नहीं
ये तो चमन के महकते गुल हैँ ये गुल ए गुलदान थोड़ी हैं

तुम्हें तो लगता  है सोयें हैं सब तुम्हें कोई देखता नहीं
सितम किये जा हज़ार ,अल्लाह भी निगहबान थोड़ी है

कई बरस से टिकी हुई बदन की जर्जर पनाह में
गलत सुना था, ये ज़िन्दगी कुछ पलों की मेहमान थोड़ी है