शनिवार, 15 फ़रवरी 2020

कर रहे हो तुम मोहब्बत,कितनी फुर्सत से मियाँ 
तुमको मिलती क्यों नहीं, फुर्सत मोहब्बत से मियाँ 

इक दफा देखो मुहब्बत से हिक़ारत की तरफ़ 
बाज़ आते क्यों नहीं हो अपनी आदत से मियाँ 

अंध आलोचक नहीं हूँ,अंध प्रशंशक भी नहीं 
मैं परखता हूँ हवा को अपनी ताक़त से मियाँ 

तुम चिरागे इल्म हो तुम बस उजाले बांटना 
देखती हैं तुमको नस्लें कितनी हसरत से मियाँ 

सिर्फ कमियां ही दिखाई देती है तुमको अगर 
अल्पज्ञानी हो या हो खुदगर्ज़ आदत से मियाँ 

चाँद ग़ज़लों के सिवा हमने दिया क्या है मगर 
लोग लेते हैं हमारा नाम इज़्ज़त से मियाँ 


मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

लोगों  के दिलों में वो ही मुक़ाम करते हैं 
शाइरी की शरीयत में जो कलाम करते हैं 

फ़िर ये तो अदब के  कद्रदानों की ही महफ़िल है 
सो अदब नवाज़ों को हम सलाम करते हैं 
ख़ुदा के बन्दों से गुफ़्तगू ,हमने तो ग़ज़ल की ज़ुबाँ  में कर ली 
सुनानी थी उसकी तान सबको, सो अपने अधरों पे मुरली धर ली 

जुदा थे हम तो ज़माने भर से ,कि  तौर उनके न आये हमको 
ख़ुदा ने तेवर दिए थे जैसे ,उसी के दम  पे  ये झोली भर ली 
इस मकीं को उस मकां में अब गवारा कौन है 
लोगों को अपने सिवा दुनिया में प्यारा कौन है 

आपके आने से पहले आप आये थे यहाँ  
जेहन ने पूछा था दिल से ये तुम्हारा कौन है 

द्वार पर फ़िर सुन के आहट मन मचल के बोल उठा 
इक दफ़ा तो थी हवा लेकिन दुबारा कौन है 

जिस तरह से सोच कर वो भेजता हमको यहाँ  
उस तरह से ज़िन्दगी आखिर गुज़ारा कौन है 

सारी दुनिया छोड़ दे चाहे तुम्हे मझधार में 
उस ख़ुदा के रहते मत कहना हमारा कौन है 

रविवार, 10 नवंबर 2019

फ़िर ये बादल आँखों पर छा ही गये 
आप हमको याद फ़िर आ ही गये 

शाख तो फ़िर से हरी हो जाती है 
पत्ते जो टूटे तो मुरझा ही गए 

कनखियों से वो हमें देखा किये 
हमने देखा तो वो शरमा ही गये 

यक ब यक हम से लिपट बैठे थे वो 
डर से ही आये मगर आ ही गए 

बेखुदी में दूर थे खुद से बहुत 
होश में फ़िर ख़ुद से  टकरा ही गये 


सोमवार, 14 अक्टूबर 2019

नफ़रत   का  दरिया बहने दे तू  सुख़नवरी कर
सच्ची कलम से  संस्कारों  की फसल खड़ी कर

दिल की ज़मीन पर एहसासों के गंगा जल से 
लोगों के छोटे छोटे दुख लिख कलम बड़ी कर 

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019

तुम्हारे इल्म ओ  फ़न को प्यार हासिल है बहुत रब का
बड़ी आसानी से कह देते हो तुम हाल ए दिल सबका 

ग़लत फ़हमी  में मत रहना बचा लेगा तुम्हे इक दिन 
भँवर  का और साहिल का अजी अब एक है तबक़ा 

अदब का वो मुहाफ़िज़ था अलम्बरदार था सच का 
मियाँ वो नेक शायर मुफ़लिसी  में मर गया कबका